एक अभिनव उदाहरण--राजकीय महाविद्यालय बाड़मेर का मैदान,समय सुबह के 4.30 मिनट,एक लंबी सिटी की आवाज के साथ एक नई सोच और कुछ कर गुजरने के उद्देश्य से एक साथ कदमो की एक संगीतमय कदमताल सुनाई पड़ती है। सुनसान सुबह को चीरती हुई आवाज "कैडेट थम" कहते ही एकाएक शांत हो जाती है।

एक विशेष आवाज जो आज हर किसी मजबूर विद्यार्थी के सपनों को साकार करने का दम भरती है। पूरा बाड़मेर उस मंद मुस्कान भरे चेहरे के पीछे छिपे गहरे राज को जानता है, शायद कुछ कर गुजरने की गहन तम्मना उसे सोने नहीं देती है और फिर सफर का आगाज शुरू हो जाता है।
वर्षों पहले मैंने बिहार के आनंद कुमार और एक आईपीएस की कहानी पढ़ी जो "सुपर 30" नाम से एक संस्थान चलाते थे और वास्तव में 30 बच्चो को लेकर उनको ही टारगेट करके वास्तव में सुपर बनाने का जज्बा लेकर अपने कार्य की परिणीति करते थे।
ऐसा ही मिलता जुलता एक उदाहरण आजकल सदा अकालों और अभावों से जूंझने वाले बाड़मेर जिले में भी देखने को मिल रहा है।
राजकीय महाविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर केप्टन (डॉ) आदर्श किशोर जाणी जिन्होंने कि बहुत ही छोटी उम्र पहले तो स्वयं बहुत अच्छा मुकाम हासिल किया और उनके स्वर्गीय पिताजी समाजसेवी श्री उमाराम जी जाणी साहब के सपनो को आज भी जिवंत रूप प्रदान करने का काम कर रहे है। अनेक विद्यार्थियों का अब तक राजकीय सेवा में चयन करवा चुके है और आज भी अनवरत प्रयासरत है।डॉ साहब सुबह 4.30 बजे उठकर उसी कॉलेज मैदान में आ डटते है जहाँ उनके साथ 100-150 जवान बालक जो कि गरीब, असहाय और महाविद्यालय परिवार से जुड़े है लेकिन आर्थिक परिस्थितियों के कारण महँगी कोचिंग क्लास नहीं जा सकते। ऐसे अनेक विद्यार्थियों के सपनो तारणहार और उनके सपनो में संजीवनी बूटी भरने का विश्वास लेकर अपने कर्तव्य पथ पर निकल पड़ते है।आज के इस स्वार्थ परक ज़माने में जहाँ इंसान के लिए पैसा ही सब कुछ है, उस परिदृश्य में सकारात्मक भावना के साथ सब कुछ निःशुल्क सेवा देने का भाव अगर कहीं देखना हो तो वो जीती जागती मूरत अपने बाड़मेर में ही मिल जायेगी। बस विद्यार्थी का जज्बा जिवंत होना चाहिए और लक्ष्य एक ही होना चाहिए फिर परिणीति होने में डॉ साहब कोई कमी नहीं रखते।उनके प्रयास के बलभूते ही उनकी टीम अविरल रूप से बढ़ती जा रहीहै उनके प्रयास का ही नतीजा है कि आज हर कोई अपनी सेवा देने को तत्पर रहता है।

समय-समय पर यहीं से राजकीय सेवा में चयनितऔर अन्य चयनित मोटिवेशन करने को तत्पर रहते है।बाड़मेर ncc और "उजास" संस्थान के बैनर तले ऐसा काम वास्तव में काबिले तारीफ है।

संदर्भ: जेठाराम पचार लोहारवा




*जय तेजाजी की बंधुओं..*
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पूर्व पोस्ट में हमने *तेजाजी के पूर्वजों* के बारे में संक्षिप्त जानकारी पढी कि वीर तेजाजी महाराज के पूर्वज किस वंश शाखा से संबंधित थे तथा कैसे मध्य भारत से चलकर मारवाड़ में अपने संघर्ष व बाहुबल के आधार पर जायल-धौळीडेह होते हुए खरनाल में गणराज्य स्थापित किया।
जैसा कि पूर्व विदित है *वीर तेजाजी महाराज के षड़दादा श्री उदयराज जी* ने खरनाल परगने पर आधिपत्य कर उसे अपने गणराज्य की राजधानी बनाया।
तत्पश्चात *नरपाल जी, कामराज जी, बक्शाजी अथवा बोहितराज तथा ताहड़ जी* ने गणराज्य का शासन भार संभाला।
नरपाल जी व कामराज जी की शासनावधि अल्पसमय ही रही।
तत्पश्चात बोहितराज जी ने शासन भार संभाला। बोहितराज कितने भाई थे तथा उन्होने कब से शासन कार्य शुरू किया इसकी उपलब्ध जानकारी अभी तक नहीं मिल पाई है।
*==बोहितराज या बक्सा जी धौळिया==*
वीर तेजाजी महाराज से संबंधित अनेक लेखकों द्वारा लिखित संक्षिप्त जीवनीयों, आम बोल चाल की वार्ताओं तथा वर्तमान समय में तेजाजी पर गाये जाने वाले गीतों में तेजाजी के पिता जी का नाम बक्साजी लिखा व बोला जातै है। मगर यह सरासर गलत और भ्रांतीपूर्ण है।
वीर तेजाजी के वंश के *भाट भैरूराम डेगाना* की पोथी में तेजाजी तक 21 पीढीयों का नाम दिया गया है, जिसमें तेजाजी के पिता का नाम *ताहड़ जी (थिरराज जी)* व दादाजी का नाम *श्री बोहतराज जी (बक्साजी)* अंकित है।
और यही प्रमाणिक सत्य है।
और आप सभी आधुनिक लेखकों से भी अनुरोध हे कि इस सत्य को हि अपने लेखन में जगह देवें।
साथ ही वर्तमान गायकों से निवेदन है कि अपने नवगीतों में किसी भी प्रकार की भ्रांती फैलाने से बच के रहें।
मेरे युवा साथियों आप तेजाजी के इतिहास को मानस पटल पर अंकित कर लेवें। अगर कहीं भी किसी लेखक या गायक द्वारा तेजाजी महाराज के इतिहास में कोई विरोधाभास दिखे तो उसका तुरंत विरोध करें।
*==बक्सा जी धौळिया==*
संत कानाराम जी ने बक्सा जी धौळिया नाम के संबंध में काफी खौज खबर जिसमें यही साबित हुआ की बोहितराज जी ही बक्सा जी थे, और तेजाजी महाराज के दादाश्री थे।
जैसा कि ग्रामीण परिवेश में प्रत्येक व्यक्ति के दो नाम अमूमन देखने को मिलते हैं उसी भांती बोहतराज जी का आम बोलचाल में बक्सा जी नाम स्वीकार्य किया गया है।
*==बक्सा जी के पुत्र==*
भाट भैंरूराम डेगाना की पोथी में बक्सा जी के सात पुत्रों का नाम सहित उल्लेख मिलता है। जिसमें से वीर तेजाजी महाराज के पिताजी श्री ताहड़ जी सबसे बड़े पुत्र थे।
इस प्रकार तेजाजी के 6 काकाओं का उल्लेख इस पोथी में है।
*मेरे आदर्श लेखक स्वर्गीय मनसुख जी रणवां जी* ने बक्साजी को तेजाजी का ताऊ लिखा है। यह प्रमाणित नहीं हो पाया।
*==ताहड़ जी का शासन भार संभालना==*
अपनी वृद्धावस्था के दौरान बक्सा जी ने अपने गणराज्य की प्रजा से रायशुमारी कर तथा सभी के सुझाव को मानते हुए ताहड़ जी को अपना उत्तराधिकारी बनाया।
जाट शासक सदैव ही गणतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास करते आये हैं। जाट गणराज्यों में अन्य जातियों की तरह राजनीतिक षड़्यंत्र देखने को नहीं मिलता।
तभी तो सभी भाईयों में छोटे होने पर भी ताहड़ जी ने वीर तेजाजी महाराज को उनकी योग्यता, काबिलियत तथा उनकी वीरता को देखते हुए अपना युवराज घोषित किया। इस पर एक भी बड़े भाई ने आपत्ति नहीं की और ना ही भाईयों में होने वाले कलंकित युद्ध व षड़्यंत्र हुए। बल्कि सभी ने वीर तेजाजी महाराज के संरक्षक के रूप में कार्य किया।
*==बक्सा जी वीर तेजाजी महाराज के संरक्षक के रूप में==*
लगभग 50-55 वर्ष की उम्र में वीर तेजाजी महाराज की हत्या कर दी गई। उनकी हत्या धौखे से हुई जिसमें जायल के डाकू "बाला" व चांग के मिणाओं का सरदार 'डाकू कालिया' था कि भूमिका रही।
*(इस घटना की जानकारी फिर कभी विस्तार से आप सभी तक पहुंचाऊंगा)*
अपने पिताजी व खरनाल के गणपति ताहड़ जी धौळिया की हत्या के समय वीर तेजाजी महाराज मात्र 9 वर्ष के थे तथा अपने ननिहाल त्यौद में मामओं के संरक्षण में रहकर अस्त्र शस्त्र, घुड़सवारी, युद्ध कौशल व शास्त्र ज्ञान ग्रहण कर रहे थे।
अपने भाइयों में सबसे कुशल ताहड़ जी ही थे। दूसरी तरफ ताहड़ जी के पुत्र भी प्रशासन को संभाल पाने के लिए उपयुक्त नहीं थे क्योंकि वे किसान की भांति ही रहे हुए थे।
अन्य जातियों के राजकुमारों की तरह जाटों के राजकुमार विलासी नहीं रहे कभी। चाहे वे राजकुमार हो मगर आम जनता की तरह ही खेती व पशुपालन का काम करते थे।
इस प्रकार ताहड़जी की असमयिक मृत्यु व वीर तेजाजी महाराज के अल्पायु होने के कारण राज्य में संकट के बादल छा गये। तब प्रजा ने एक स्वर में कहा कि *'बोहतराज' जी को ही पुन: गणपति व तेजाजी के व्यस्क होने तक उनका संरक्षक बनाया जाये।* अपनी प्यारी जनता की राय को सर आंखो पर रखकर 'बक्सा जी' पुनः गणपति पद पर आसीन हुए।
और यहीं से बक्सा जी का तेजाजी के पिता होने की भ्रांति हमारी पीढी तक पहुंची।
बक्सा जी वीर तेजाजी महाराज के दादाजी थे और यही सत्य है। वीर तेजाजी के संरक्षक के रूप में होने के कारण आधुनिक लेखकों द्वारा उन्हें तेजाजी के पिता समझ लिया गया।
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प्रिय बंधुओं बक्सा जी के बारे में लिखित इतिहास ना के बराबर उपलब्ध है मगर मेरे गुरु व शोधकर्ता संत कान्हाराम जी व मैंने तेजाजी के ज्ञात इतिहास से संबद्ध कर तथा कुछ अपने स्तर पर दिमागी कसरत करके तात्कालिक घटनाओं को एकसूत्र में पिरोने का प्रयास किया है। इन घटनाओं व इतिहास थौड़ी बहुत खामी रह सकती है मगर तेजाजी महाराज के इतिहास को देखते हुए ये घटनाएं सत्य है इसका हम दावा कर सकते हैं।
...
*वीर तेजाजी महाराज के इतिहास अगली कड़ी में हम तेजाजी के माता (रामकुंवरी व रामी) पिता (ताहड़जी) के विवाह व तेजाजी के बड़े भाईयों के संबंध में चर्चा करेंगे।*
*~ जय वीर तेजाजी ~*
> *लेखक*
*बलवीर घिंटाला तेजाभक्त बूड़सू*
मकराना नागौर
9414980415
*संत कान्हाराम (अध्यापक)*
सुरसुरा, अजमेर
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जय वीर तेजाजी बंधुओं..
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आज तेजाजी महाराज के पूर्वजों की जानकारी आपको देने का प्रयास करूंगा। किसी भी प्रकार की त्रुटी हो अथवा इसके अलावा कोई नवीन तथ्य या जानकारी आपके पास उपलब्ध हो तो प्रत्युत्तर में अवश्य बतायें।
...
जैसा की आप जानते हैं वीर तेजाजी महाराज नागवंशी जाट थे।
प्राचीन आर्यों के मूल रूप से चार वंश थे। जिसमें से एक मुख्य वंश 'नागवंश' था। इस नागवंश की 9 ज्ञात शाखाएं मानी गई है। इन्हीं नौ शाखाओं में से एक थी- श्वेतनाग शाखा।
ईसी शाखा से तेजाजी के पूर्वज संबंधित थे।
जैसा की मारवाड़ क्षैत्र में सफेद को धौळा कहा जाता है। उसी तरह श्वेतनाग से धौळिया नाग शब्द का प्रचलन शुरू हो गया। जब तेजाजी पूर्वज मध्य भारत से मारवाड़ की तरफ आये तो वे श्वेतनाग जाट से धौळीया गौत्री नागवंशी जाट के रूप में मारवाड़ के जायल क्षैत्र में आबाद हुए।
यहां के मूलनिवासी काला गौत्री जाट थे जिनके 27 गांव आबाद थे। जो कि प्राचीन काल से बसे थे और यहां की भूपती थे।
जब धौलिया गौत्री जाटों ने जायल में बसना चाहा तो राजनीतक कारणों के चलते काला गौत्री जाटों से उनका संघर्ष हुआ। इस झगड़े में जीत धौळियों की हुई मगर दुश्मनी का यह बीज सदीयों तक निरंतर प्रस्फुट्टित होता रहा। (इसी कुंठावश काला गौत्री जाटों ने जायल के खींचियों के साथ मिलकर तेजाजी के पूर्वजों के संबंध में उलजुलूल व मनगढंत कहानियां फैलायी। जिसके परिणामस्वरूप तेजाजी को राजपूत तक घौषित कर दिया। और दुर्भाग्य देखो आज के कुछ नासमझ जाट भी इस भ्रांती का भूसा दिमाग में लिये घूम रहे हैं)
काला जाटों से कभी न खत्म होने वाले इस झगड़े को देखते हुए तथा कालों पर रहम करके धौळिया जाट औसीयां-नागौर सीमा पर स्थित गांव करणू (धौलीडेह) में निवासित हुए। 
(डेहर/डेह/बाढ यह एक समतल खेत का प्रकार होता है। जो पशुचारण व खेती के लिए प्रयोग में लिया जाता है।)
इसी कारण यह क्षैत्र "धौळियों की डेह" अर्थात् "धौळीडेह" कहलाया।
मगर यह क्षैत्र समृद्ध ना समझते हुए तेजाजी के षड़दादा व धौळिया जाटों के 16 वीं पीढी के भूपति उदयराज जी धौळिया ने वर्तमान खरनाल (पूर्व में करनाल भी) के खौजा व खौखर जाटों को पराजीत कर अपना गणराज्य स्थापित किया।
उधर काला जाटों का जायल के पास के बडीयासर जाटों के साथ भीषण रक्तपात हुआ, जिसमें काला जाटों के समस्त खेड़े उजाड़ दिये गये। 
यह युद्ध खींयाला का युद्ध कहलाता है। यह युद्ध लगभग 1350-1450 के मध्य में हुआ था। अवश्य ही खींयाळा अत्यधिक भीषण युद्ध रहा होगा क्योंकि यह युद्ध दो जाट शक्तियों के मध्य हुआ था। मगर यह युद्ध इतिहास में अंकित नहीं है..क्योंकि तब का जाट अनपढ था और अभी का जाट सोया हुआ। जो यह प्रयत्न जानने का प्रयत्न ही नहीं करना चाहता कि हमारे पूर्वज क्या थे। 
तो बंधुओं इस युद्ध में काला जाटों की निर्णायक हार हुई और उसके बाद काला जाट जायल क्षैत्र को छौड़कर चले गये और दूर के गांवो में बंटकर रहने लगे। आज जायल क्षैत्र में बडीयासर जाटों का अच्छा
कुनबा है। कई सौ गांवो में बडियासर जाट निवास करते हैं। 8-10 गांव पूर्ण रूप से बडियासर जाटों के है। 
खिंयाळा गांव व कंवरसी तालाब के पास कंवरसी झाड़ी व गांव में आज भी खिंयाळा युद्ध के जांबांज जाटों के देवळे मौजूद है।
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अब लौटते है फिर से तेजाजी के पूर्वजों की और...
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जैसा कि अब तक पढा तेजाजी के षड़दादा उदयराज जी ने खरनाल परगने को अपनी राजधानी बनाया। और एक अच्छे गणपति के रूप में अपने गणराज्य को चलाया।
उनके बाद के गणपति निम्न प्रकार से थे।
उदयराज > नरपाल > कामराज > बोहितराज (बक्साजी) > ताहड़देव (थिरराज) > तेजराज (तेजाजी)
(यह वंशावली धौलिया जाटों के भाट भैंरूराम की पौथी में बाकायदा लिपिबद्ध है)
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बक्साजी कौन थे?
बक्साजी तेजाजी महाराज के पिता थे या दादा?
बक्साजी अगर दादा थे तो उनका नाम तेजाजी से क्यूं जौड़ा जाता है?
बक्साजी के पुत्र कौन कौन थे?
इन सभी प्रश्नों के उत्तर वीर तेजाजी के आशीर्वाद से जल्द ही आप तक पहुंचाने का प्रयास करूंगा।
~ जय वीर तेजाजी ~
लेखक-
Balveer Ghintala 'तेजाभक्त'
मकराना नागौर
9414980415
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संत कान्हाराम
सुरसुरा , अजमेर
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राम राम सा बंधुओं...
अब तक हमने तेजाजी के पूर्वजों द्वारा खरनाळ गणराज्य की स्थापना करना, तत्पश्चात वीर तेजाजी महाराज के दादाश्री बोहतराज जी (बक्सा जी) के बारे में पढ़ लिया है। इससे आगे की श्रृंखला में आज हम बोहितराज जी के बड़े पुत्र व तेजाजी महाराज के पिताजी श्री ताहड़ जी (थिरराज), उनके पुत्रों व तेजाजी के जन्म के विषय में बात करेंगें ।
                                                           =प्रारंभिक जानकारी=
वैसे श्री बक्साजी व ताहड़ जी के कालक्रम की व्यवस्थित जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाई है। बक्साजी ने वृद्धावस्था में प्रवेश करते ही अपने गणराज्य की कमान प्रजा के आदेशानुसार अपने सबसे बड़े पुत्र ताहड़ जी को सौंप दी। 
बक्सा जी के सात पुत्र हुए थे जिनमें ताहड़ जी अस्त्र शस्त्र विद्या, युद्ध कौशल, धर्म व नीति की शिक्षा में सभी भाईयों से अधिक निपुण थे। इस प्रकार समस्त गणराज्य का भार ताहड़ जी को सौंपकर स्वयं संरक्षक में बक्साजी गणराज्य का संचालन करते रहे।
                                                              =ताहड़ जी का विवाह=
खरनाल परगने के जाट शासक (गणपति) बक्साजी धौळिया के बड़े पुत्र श्री ताहड़देव का विवाह त्योद (त्रयोद) के गणपति करसणजी के पुत्र राव दूल्हण जी सोढी (ज्याणी) की पुत्री रामकुंवरी के साथ वि. सं. 1104 में सम्पन्न हुआ था। 
(यह त्योद गांव अजमेर जिले के किशनगढ परगने से 22 किमी उत्तर दिशा में स्थित है)
                                                         =ताहड़ जी का दूसरा विवाह=
विवाह के 12 वर्ष पश्चात भी रामकुंवरी के पुत्रप्राप्ती नहीं हुई। सम्पूर्ण गणराज्य शोक के गर्त में डूबा चला जा रहा था। बक्साजी धौळिया भी इस चिंता में अस्वस्थ होते चले गये। खरनाळ गणराज्य इस समय अपने गणपति के दुख में आंसू बहा रहा था।
अपनी प्रजा, पति व श्वसुर के दुख ने रामकुंवरी को अंदर तक विचलित कर दिया। ऐसे समय में अपने ह्रदय को कठोर करके रामकुंवरी ने अपने पतिदेव ताहड़ जी को दूसरा विवाह करने का कहा। जिस पर ताहड़ जी ने मना कर दिया। मगर गणराज्य की खुशहाली, पिताजी की अस्वस्थता और पत्नी के हठ के आगे उन्हें झुकना पड़ा।
और इस तरह ना चाहते हुए भी ताहड़ जी का दूसरा विवाह कोयलापाटन (वर्तमान आठ्यासन) निवासी अखोजी (ईंटोजी) के पौत्र व जेठोजी के पुत्र करणो जी फिड़ौदा की पुत्री रामीदेवी के साथ वि.सं. 1116 में सम्पन्न हुआ। (इस विवाह का वर्णन फिड़ौदा जाटों के हरसोलाव निवासी भाटों की पोथी में आज भी वर्णित है)
यह संयोग था या ईश्वर प्रदत वरदान कि वीर तेजाजी महाराज की दोनों माताओं का नाम 'राम' से शुरू होता था।
                                                        =ताहड़ जी के पुत्र=
ताहड़ जी का रामी देवी से विवाह संपन्न होने के पश्चात उनके 5 पुत्रों का जन्म हुआ। जो इस प्रकार थे- 
1) रूप जी (धर्मपत्नी रतनी खींचड़),
2) रण जी (धर्मपत्नी शेरां टांडी), 
3) गुण जी (धर्मपत्नी रीतां भांभू), 
4) महेश जी (धर्मपत्नी राजां बसवाणी), और 
5) नग जी (धर्मपत्नी माया बटिमासर)।
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इनमें से रूप जी की पीढी इस प्रकार है-
दोवड़सी- जस्स जी- शेराराम जी- अरस जी- सुवाराम जी- मेवाराम जी- हरपाल जी।
(कई जगह लोकवार्ताओं में तेजाजी की भाभी का नाम केलां उच्चारित किया जाता है, मगर भाटों की पोथी में इसका कहीं भी उल्लेख नहीं है)
                                                  =रामकुंवरी का पीहर गमन व तपस्या=
ताहड़ जी के दूसरे विवाह के पश्चात रामकुंवरी अपने पीहर त्योद आकर रहने लगी व अपने कुलगुरू मंगलनाथ जी के निर्देशन में भौलेनाथ व नागदेवता की पूजा अर्चना करने लगी। 
लगभग 10-12 वर्ष पूजा व तप करने के पश्चात नागदेवता के वरदान से रामकुंवरी की कोख से उस वीर का जन्म हुआ जिसने सदियों तक के लिए लाखों किसानों को को अमर इतिहास दे दिया। वीर तेजाजी का जन्म नागदेवता के आशीष से हुआ था। नागदेवता जिनकी पूजा रामकुंवरी करती थी इनकी बांबी त्योद व पनेर के मध्य स्थित जंगल में आज भी विद्यमान है। मगर वर्तमान में इस जगह वीर तेजाजी बलिदान स्थल गांव सुर्रा (सुरसुरा) आबाद हो चुका है। तथा यह बांबी मुख्य मंदिर के गर्भगृह के अंदर वीर तेजाजी की भूप्रकट देवलियों के पास आज भी अवस्थित है। 
यह संयोग था या फिर विधि का लिखा विधान की जिन नागदेवता ने ने वरदान स्वरूप वीर तेजाजी को भूलोक पर भेजा उन्हीं ने वापस तेजाजी का खुद में समा लिया। शायद कलयुग के पापियों को दंड देने, व जनसाधारण का उद्धार करने के उद्धेश्य से ही वीर तेजाजी का जन्म हुआ था।
                                                         =तेजल-राजल का जन्म=
माता रामकुंवरी की कठोर साधना व नागदेवता के आशीष स्वरूप वि. सं. 1130 की माघ सुदी 14 गुरूवार, (29 जनवरी 1074) को खरनाल गणराज्य के कुलदीपक, कषकों के उपकारी, गरीब मजलूमों के रक्षक व जीवदया की साक्षात मूर्ति श्री वीर तेजाजी महाराज का जन्म हुआ। मुख पर सूर्य सा तेज लिए व रक्तिम आभायुक्त शरीर के जन्म का समाचार सुनकर त्योद व खरनाळ गणराज्य में जैसे खुशियों की सौगात बिखर गई। त्योद गांव की प्रजा ने अपने भाणजे को सर आंखो में बिठा लिया तो दूसरी तरफ खरनाळ की प्रजा अपने राजकुमार को देखने के लिए ललायित हो उठी।
वीर तेजाजी के जन्म के 3 वर्ष पश्चात साक्षात देवीस्वरूप लिये वि. सं. 1133 में राजल बाई का जन्म हुआ। 6 भाईयों की इकलोती व सबसे छोटी लाडली - राजल बहन। जिनके भातृप्रेम की मिशालें युगों युगों तक दी जायेगी।
                                                      =तेजाजी का खरनाल आगमन=
त्योद में तेजल राजकुमार के जन्मोत्सव की तैयारियां जोरों पर थी। उधर खरनाल से ताहड़ जी, उनकी धर्मपत्नी रामी व पांचों पुत्र तथा गणराज्य के कुछ वरिष्ठजन त्योद के लिए रवाना हो गये। निश्चित समय पर नामकरण समारोह संपन्न हुआ। रामी ने पुत्र तेजल को गौद में लेकर मातृप्रेम से सरोबार कर दिया तो पांचो भाईयों अपने छोटे बीर के साथ पूरे दिन हंसते खेलते रहे। हर किसी सदस्य के आंखो में खुशी की बूंदे झिलमिला रही थी। हर कोई खरनाळ गणराज्य की किस्मत पर आज गर्व की गाथाएं उच्चरित कर रहा था। खरनाळ की प्रजा की हठ, दादा बक्सा जी की पौत्रदर्शन की लालसा से वशीभूत हो तथा बहन रामी की प्रार्थना का मान रखते हुए माता रामकुंवरी अपने पुत्र तेजल को ले परिवारजनों के साथ खरनाळ के लिए रवाना हुई।
                                            =खरनाळ में जन्मोत्सव व युवराज की घोषणा=
अपने राजकुमार के स्वागत में गणराज्य की प्रजा ने पलक पांवड़े बिछा दिये। मूंडवा ग्राम जो कि गणराज्य की सीमा पर स्थित था, समस्त प्रजा वहां अपने राजकुमार की अगवानी करने पहुंच गई। तेजल, दोनों माताओं, पांचों राजकुमारों व गणपति ताहड़ जी को गाजे बाजे के साथ मूंडवा से खरनाळ लाया गया। जहां तेजाजी के काका-काकियों, व दादाजी द्वारा स्वागत किया गया।
पूरे गणराज्य में उस दिन उत्सव का माहौल था।
                                                =तेजाजी को युवराज घोषित करना=
समस्त प्रजा व परिवार जनों की उपस्थिति में बक्सा जी ने युवराज घोषित करने की इच्छा जाहिर की। प्रजा तेजल राजकुमार को युवराज घोषित होने की सूचना सुनने को ललायित थी मगर ताहड़ जी व बक्साजी तेजल से बड़े 5 भाईयों के होते यह फैसला लेने में हिचकिचा रहे थे। इस शंका का निवारण अंतत: तेजल राजकुमार की दूसरी माता रामीदेवी ने किया। बहन रामकुंवरी के बलिदान, तप व अपने पर किये उपकार के फलस्वरूप अपने पुत्रों को युवराज घोषित करने हेतू ताहड़ जी को मना कर दिया। 12 वर्ष के कठोर तप से जन्मे सौभाग्यशाली पुत्र तेजल को ही युवराज घोषित करने की इच्छा जताई। 
एक जाटनी ने जहां गणराज्य की समृर्द्धि हेतू जीते जी अपने पति को दूसरे विवाह के लिए मनाया तो वहीं दूसरी जाटनी ने पुत्रप्रेम को दरकिनार कर उनका ॠण चुका दिया। धन्य है जाट की जायी ऐसी सतवंती व मजबूत नारियां। और बड़भागी थे वीर तेजाजी महाराज जिन्हें अपने नाम (राम) के अनुरूप ही शील, धीर, व मातृत्व की प्रतिमूर्ति माताएं पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
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वीर तेजाजी का विवाह
वीर तेजाजी की प्रारंभिक शिक्षा-दिक्षा
अगली कड़ी में....... 
..जय वीर तेजाजी महाराज...
लेखक-
Balveer Ghintala 'तेजाभक्त'
मकराना नागौर
9414980415
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संत कान्हाराम (अध्यापक)
सुरसुरा, अजमेर
9460360907
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राम राम सा बंधुओं..
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अब तक हमने वीर तेजाजी महाराज के पूर्वजों से लेकर वीर तेजाजी के जन्म तक की घटनाओं का क्रमबद्ध रूप से अध्ययन किया है। अब तेजाजी के माता पिता की तीर्थ यात्रा व तेजाजी के विवाह पश्चात घटित घटनाओं पर चर्चा करेंगे।
बंधुओं मेरा उद्देश्य तेजाजी के इतिहास में आये किसी भी पात्र, घटना या किसी जाट गौत्र पर कटाक्ष करना नहीं है बल्कि यह तेजाजी के जीवन से जुड़ी वास्तविकता है जिसे शब्दों में उकेरने का प्रयास किया है। अगर किसी बात पर आपको ठेस पहुंचे तो जाट भाई समझ के माफ करना। 
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                                                =तेजाजी के माता पिता की तीर्थ यात्रा=
खरनाळ गणराज्य में तेजाजी के जन्मोत्सव के कुछ महिनों बाद एक दिन माता रामकुंवरी ने ताहड़ जी से अनुरोध किया कि हमें तीर्थराज पुष्कर चलना चाहिए। क्योंकि उस समय की यह परिपाटी रही थी कि संतान प्राप्ति के पश्चात गणपति तीर्थ यात्रा जाते थे तथा पुत्र स्नान के पश्चात यज्ञ व दानदक्षिणा किया करते थे।
माता रामकुंवरी ने भी ताहड़ जी से तीर्थ यात्रा पर चलने का अनुरोध किया तथा वापसी में नागदेवता की बांबी पर धौक देकर आने को बोला जिनकी कृपा से तेजल वीर का जन्म हुआ था।
देवप्रबोधिनी एकादशी के एक दिन पहले वि. सं. 1131 की कार्तिक शुक्ल दशमी के दिन प्रातः तेजल को लेकर सपत्नी ताहड़ जी पुष्कर यात्रा के लिए निकल पड़े।
गाड़ी में धन-धान्य दानदक्षिणा हेतू साथ ले लिया। अपने ईष्ट मित्रों व तेजाजी के एक काकाश्री आसकरण जी यात्रा में साथ आये।
देवप्रबोधिनी के दिन पूरे संघ ने पुष्कर के नाग घाट पर निर्मल जल में संध्यास्नान किया। तेजल कुंवर को स्नानादि करवा नागघाट पर मंगल कामना की गई। दीन दुखियों को मुक्तहस्त से दान दक्षिणा दी गई। और ब्राह्मणों को भोज दिया गया।
उस जमाने में संतानप्राप्ति के बाद पुष्कर तीर्थ यात्रा परिपाटी थी। पनेरगढ के गणपति रायमल मुहता को भी पेमल के रूप में पुत्री धन की प्राप्ति हुई थी। (वीर तेजाजी के जन्म के तीन माह पश्चात सती पेमल का जन्म हुआ था।) अत: रायमल जी भी सपरिवार पुष्कर पधारे हुए थे।
गढ खरनाळ व गढ पनेर के दोनों गणपतियों ने एक दूजे को राम राम किया। कुशलक्षेम पूछी। 
दोनों परिवार एकादशी से पूर्णिमा तक साथ-साथ स्नान ध्यान, देवदर्शन, दानदक्षिणा करते। दोनों का परिचय घनिष्ठता में बदल गया।
तब तेजल नौ मास के व पेमल छ: मास की थी। तेजाजी के काका आसकरण जी ने घनिष्ठता को रिश्तेदारी में बदलने का प्रस्ताव रायमल जी व ताहड़ जी के समक्ष रखा तो दोनों ने एक स्वर में हां कह दिया।
                                                              =तेजा पेमल का विवाह=
उस समय दोनों परिवार पुष्कर जैसे पवित्र स्थल की शरण में थे। पुष्कर पूर्णिमा जैसा पवित्र शुभ मुहुर्त भी नजदीक था। तथा शादी संपन्न करवाने हेतू एक से एक विद्वान पंडित भी पुष्कर में मौजूद थे। दोनों गणपतियों का कुल भी जाट जैसे उच्च कुल से संबंधित था। ऐसा पावन संयोग मानो देवतागण भी इस विवाह के लिए अति आकुल हो रहे थे। 
विवाह की तैयारियां होने लगी। पूर्णिमा में मात्र तीन दिन शेष रह गये थे। विवाह की स्वीकृति के लिए तेजाजी व पेमल के मामाओं को बुलावा भेजा गया। तेजाजी के मामाजी त्योद गांव के हेमूजी सोढी तय समय पर पुष्कर पहुंच गये। दूसरी तरफ पेमल का ननिहाल थौड़ा दूर था। पेमल का ननिहाल जायल के कालाओं में था। इसलिए पेमल के मामा श्री 'खाजू काला जी' को थौड़ी देर हो गई। 
दूसरी तरफ बूढे पुष्कर के नाग घाट पर रूपवान तेजल और सुकोमल रूपवति पेमल का वैदिक मंत्रोचार के साथ विसं 1131 पुष्कर पूर्णिमा की गौधूली वैला में विवाह संपन्न हुआ। पेमल के मामाजी फेरों के समय विवाह स्थल पर पहुंचे। विवाह संपन्न होने के पश्चात खाजू जी को पता चला कि उनकी भानजी का विवाह पारिवारिक दुश्मन ताहड़ जी के पुत्र के साथ संपन्न हुआ है। काला व धौळिया गौत्री जाट शासकों में काफी पहले से दुश्मनी चली आ रही थी। और इस तरह विवाह की उस शुभघड़ी में अनहोनी हो गई।
                                                              =पेमल के मामा की हत्या=
पेमल के मामा को यह संबंध गले नहीं उतरा। अत: वे पुष्कर घाट पर ही ताहड़ जी को भला बुरा कहने लगे। आसकरण जी व रायमल जी मुहता ने बीचबचाव का बहुत प्रयास किया। सदियों पुरानी दुश्मनी भूलकर अच्छी रिश्तेदारी निभाने की प्रार्थना की। अपने पूर्वजों द्वारा की गई राजनीतिक भूल के लिए ताहड़ जी ने खाजू जी काला से माफी भी मांगी। मगर क्रोध मनुष्य की सोचने की शक्ति खत्म कर देता है। एक तो जाट का खून, ऊपर से सीने में धधकती अपने पूर्वजों की हत्या के बदले की भावना ने खाजू जी को अंधा बना दिया। जब बात हद से आगे बढ गई तो खाजू जी व ताहड़ जी तलवारें लिये आमने सामने हो गये। पुष्कर का पवित्र नागघाट कहां विवाह की सुंदर शहनाईयों से गूंज रहा था, तलवारों की खनक में गरजने लग गया। दोनों ही पराक्रमी जाट यौद्धा मरने मारने को उतारू हो चुके थे। दोनों परिवार ना चाहते हुए भी इस काल निमित्त युद्ध को आंखों से देख रहे थे। और इस तरह वो घटित हो गया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। वीर तेजाजी के पिता ताहड़ जी के हाथों खाजू जी काला का वध हो गया। होना क्या था और हो क्या गया। क्रोध शांत हुआ तब ताहड़ जी को बहुत आत्मग्लानी हुई। दोनों परिवारों से हाथ जौड़कर माफी मांगी। रायमल जी समझदार व्यक्ति थे। उनकी नजर में खाजू जी को उनके किये की सजा मिली थी। क्योंकि सभी द्वारा समझाने पर भी उन्होने दोस्ती का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। रायमल जी ने पेमल के मामा की अति को समझने के कारण इस हादसे को दिल से नहीं लगाया। मगर पेमल की मां बेदल दे इसे दिल से लगा बैठी।अपनों की क्षति भला बुरा नहीं देखती। भाई की मौत पर वह भड़क उठी। उसने पुष्कर घाट पर ही प्रतिज्ञा कर ली कि खून का बदला खून से लेगी। विवाह संबंध विच्छेद का भी अपना आदेश सुना दिया। रायमल जी के बहुत समझाने पर भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ। आखिर रायमल जी ने यह सोचकर कि हादसे के घाव समय के मरहम से भर जायेंगे, वापस पनेरगढ जाने की तैयारी करने लगे।
                                                        ==पुष्कर से प्रस्थान=
पेमल के मामा की अवांछित हत्या ने दोनों परिवारों को अंदर तक झकझोर दिया। अब और कोई अनहोनी न हो जाये इस डर से दोनों संघ अपने अपने गणराज्य की तरफ प्रस्थान कर गये। तेजाजी के माता पिता की नागदेवता के बांबी के दर्शन की अभिलाषा मन में ही रह गई। सोचा क्या था, और क्या हो गया। मगर होनी को कौन टाल सकता है।
                                                     =बोदल दे का बालू से मिलना=
तेजाजी की सासू मां (बोदलदे) का प्रतिशोध सातवें आसमान पर था। हर पल हरघड़ी अपने भाई की मौत का बदला लेने की दुर्भावना अपने ह्रदय में पालती रही। उसके पीहर में बालू नाम का एक आदमी बदमाशों के गुट का सरदार था। चांग के कालिया मीणा मेरवाड़ा के तथा बालू मारवाड़ का कुख्यात धाड़वी थे। पशुधन चौरी, लूटपाट जैसे अपराध के लिए अपने अपने क्षेत्र में ये दोनों प्रसिद्ध थे। और दोनों अच्छे मित्र भी थे। क्योंकि चोर चोर मोसेरे भाई। 
बालू ने बोदलदे को कालिया से मिलाया। जिसे बालू की सलाह पर बोदलदे ने राखीबंध भाई बनाकर अपना दुखड़ा सुनाया। बोदलदे ने अपने प्रतिशोध की बात कालिया व बालू के सामने रखी तथा खून का बदला खून से लेने की बात दोहराई। कालिया ने अपनी मुंहबोली बहन को वचन दिया। और इस तरह कालिया व बालू बदले की भावना से ग्रसित मौके की तलाश में रहने लगे। कई बार इन आक्रांताओं ने खरनाळ गणराज्य में चोरी, लूटपाट व फसलों को नुकसान पहुंचाया। मगर खरनाल गणपति ताहड़जी ने हर प्रतिरोध का मुंहतौड़ जवाब दिया। इसी लुकाछिपी व छद्मयुद्धों में 9 वर्ष व्यतीत हो गए। दोनों पक्षों का पलड़ा बराबर रहा।
                                                                 =ताहड़ जी की हत्या=
राजकुमार तेजाजी 9-10 वर्ष की आयु के थे तब तक सबकुछ ठीक चल रहा था। कालिया-बालू की कुटिलताएं जारी थी मगर खरनाल सावधान था तथा अपनी उन्नति में अग्रसर था। 
विसं. 1139 के आसपास आसोज माह में गणराज्य की फसल देखने की लालसा से गणपति ताहड़ जी घोड़े पर सवार होकर दिन के तीसरे पहर खेतों की और निकल पड़े। दूसरी तरफ एक रात पहले से ही कालीया मीणा व बालू घात लगाये बैठे थे। सुअवसर जान कर दोनों सरदारों ने दलबल सहित ताहड़जी पर हमला बोल दिया। और ताहड़जी दुश्मनों से लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गए। खरनाल में खबर पहुंचने तक दुश्मन उत्तर दिशा की तरफ भाग खड़े हुए। तेजाजी के वीर काका आसकरण जी ने दुश्मनों का पीछा कर ललकारा मगर शत्रु का संख्या बल में अधिक होने के कारण आसकरण जी भी अंतत: वीरगति को प्राप्त हुए।
........
तेजाजी की शिक्षा दिक्षा
तेजाजी ननिहाल में
तेजाजी का खरनाल आना.. 
यह सभी वृतांत अगली कड़ी में.... 
...
~ जय वीर तेजाजी ~
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लेखक-
Balveer Ghintala 'तेजाभक्त'
मकराना नागौर
9414980415
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संत कान्हाराम (अध्यापक)
सुरसुरा, अजमेर
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आपको जट्टकी लिपि से रूबरू कराते है ।संसार में एक ग्लोबल कल्चरल ट्राइब हुई है जिसका वखान विश्व की सभी हिस्टोरियन्स लॉबी ने किया है जो प्रूव्ड है ।

इतिहास के पितामह हेरोडोट्स ने जट्ट के कल्चर को तथ्यों से जोड़ा है ।
प्राकृत भाषा जिस से पाली ,पंजाबी,ठेठ खड़ी ,बृज,अवधी,आदि अनेको भाषाएं विकसित हुई प्राकृत भाषा का मूल स्रोत जाटकी लिपि थी ।

ग्रिम्ज लॉ ऑफ़ वेरिएशन के मुताबिक भाषा विज्ञान में सबसे जट्टकी लिपि प्राकृत भाषा ही आदिकालीन है ।
जट्टकी लिपि धार्मिक ठेकेदारों की संस्कृत और फ़ारसी से प्राचीन है इसी जो तोड़ फोड़ कर यह भाषाएं विकसित की गयी है ।


कुछ ऐसा लिखूँ अपनी लेखनी से कि
हर किसान के रक्त में उबाल ला दूँ
कुछ ऐसा करूँ आंदोलन कि
हर सोये किसान का अभिमान जगा दूँ
माँ भारती करना ऐसी कुछ कृपा कि
अपने हर एक किसान भाई को उसका मान सम्मान दिला दूँ
और अपने लहू की हर एक बूँद को
किसान भाइयो के इतिहास की स्याही बना दूँ
खुद मिट जाऊ किसानों के सम्मान की राह पे
पर इतना साथ देना इस  बुरडक को कि
अपने किसान भाइयो के हर एक दुश्मन को
कलम रूपी तलवार की भेट चढ़ा दूँ...
पत्रकार जीतू बुरडक





जंग का ऐलान हुआ तो मैं भी जाऊंगा लडऩे... इस बार गया तो 100 को मारकर आऊंगा...'

सीकर. ये हैं दिगेन्द्र सिंह। बहादुर फौजी। पाक की नापाक हरकत से इनका भी खून खौल रहा है। 1999 के करगिल युद्ध ने इन्होंने अदम्य साहस दिखाते हुए पाकिस्तान की फौज को धूल चटा दी थी। 5 गोलियां खाकर भी सीकर जिले के गांव झालरा का यह फौजी बेटा हिन्दुस्तान को करगिल में विजय मिलने तक लड़ता रहा। ..

रिटायर होने के बाद भी देश की रक्षा का जज्बा इनमें कूट-कूटकर भरा हुआ है। राजस्थान पत्रिका डॉट कॉम से बातचीत में इन्होंने कहा कि इस बार जंग हुई तो ये लडऩे के लिए बॉर्डर पर जरूर जाएंगे। इसके लिए भले ही भारत सरकार या इनकी बटालियन आदेश दे या नहीं दे, मगर जिस दिन युद्ध की घोषणा होगी ये बिस्तर उठाकर अपनी बटालियन के पास चले जाएंगे और उनसे युद्ध लडऩे की अनुमति लेने की हर संभव कोशिश करेंगे।

47 वर्षीय दिगेन्द्र सिंह 2005 में रिटायर हो चुके हैं, मगर खुद को अब भी युद्ध लडऩे के काबिल मानते हैं।
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सेना की सबसे बेहतरीन बटालियन 2 राजपूताना रायफल्स में थे दिगेन्द्र सिंह।
-करगिल युद्ध में दिगेन्द्र सिंह ने चाकू से पाकिस्तान के मेजर अनवर का सिर काटकर उसमेंं तिरंगा फहरा दिया था।
-1999 में दिगेन्द्र ने कुल 48 पाकिस्तानी फौजी व घुसपैठिए मारे थे। इस बार इनका इरादा सौ के आंकड़े को पार करने का है।
-दिगेन्द्र सिंह कहते हैं कि मेरे पास युद्ध का तर्जुबा है। लडऩे भी नहीं दिया गया तो मैं मेरे साथी फौजियों को बचा तो सकता हूँ।
-करगिल युद्ध में दिगेन्द्र सिंह के सीने में 3, हाथ व पैर में एक-एक गोली लगी थी।
-युद्ध के बाद दिगेन्द्र सिंह को राष्ट्रपति ने महावीर चक्र से नवाजा था।
-दिगेन्द्र कुमार को इंडियन आर्मी को बेस्ट कोबरा कमांडो के रूप में भी जाना जाता था।





थाल सजाकर गौरव का, चले हैं पूजने वीर प्रसूता,
लोहागढ का दंभ पूजने, नमन सूरज की पौरूषता,
चले झूमते मस्ती में हम, ना अपना पथ आये भूल,
 वहीं हमारा दीप जलेगा, चढेगा वहीं विजयी फूल,
ना देख सकूं निज जीवन, ना दृष्टि ईश दर्शन को है तरसी,
 बस देख लूं लोहागढ को, मेरी आंखे बरसों से है प्यासी,
ना प्रयाग रामेश्वर गंगाकूल, इधर ना हरिद्वार काशी,
इसी जगह है तीर्थ हमारा भीषण गरजे जाटवंशी,
अपने अचल स्वतंत्र दुर्ग पर, सुनकर बैरी की बोली,
निकल पड़ी लेकर तलवारें, जहां जाट जवानों की टोली,
 रानियों ने जहां देशहित, पति संग समर लड़ते देखा,
जिस मिट्टी की रक्षा खातिर, बच्चे बच्चे को मरते देखा,
 जहां जवाहर ने तांडव रचाया, दिल्ली की ज्वाला पर,
 क्षणभर वहीं समाधि लगेगी, बैठ उसी मृग-छाला पर,
वह आकुल रहती थी असी, प्रणय मिलन नरमुंडो से,
थे भिड़ाते अपने वज्र वक्षों को, वे जाटवीर गजसुंडो से,
शरणागत को देव समझ वे, नहीं डरे ललकारों से,
 रण को प्रिय खेल समझ वे, जीत छीनते भयहारों से,
 तुर्क फिरंगी अर रजपूतों का, दर्प पिघलाया सर-कृपाणों से,
 वे भीषण क्रोधी लोहागढ के, नहीं मोह पाले कभी प्राणों के,
है नमन तुम्हें शत शत जाटवीरों, घमंड नहीं गर्व बोल रहा मेरा,
इसी लोहागढ की प्राचीरों से, था निकला स्वतंत्रता का सवेरा,
'तेजाभक्त' पूजन करने आया, रक्ततिलक करने भाल कपालों पे,
कर दिये शीश अर्पण जाटवीरों, काट काट अरिनालों पे,

.... -लेखक- Balveer Ghintala 'तेजाभक्त' मकराना नागौर 9414980415 --- ------

राम राम सा..जय वीर तेजाजी....वीर तेजाजी इतिहास अवलोकन की अगली कड़ी में आज आपको नागौर जिले के एक गांव लूणसरा की जानकारी देना चाहेंगे जो वीर तेजाजी महाराज के आशीर्वाद से फल फूल रहा है।..सर्वप्रथम मैं मेरे मित्रों झूमर जी डूकिया जायल व रामस्वरूप जी जाट लूणसरा को धन्यवाद देना चाहूंगा जिनके कारण लूणसरा गांव के इस चमत्कारी तेजाधाम का दर्शन करने का आप और हमें मौका मिला।...पिछली बार हमने आपको तेजा पथ की जानकारी दी थी। इसी तेजा पथ के अंतर्गत यह लूणसरा गांव मौजूद है। जन्मस्थली खरनाल से 60 किमी पूर्व में यह गांव जायल तहसिल में अवस्थित है।ससुराल जाते वक्त तेजाजी महाराज व लीलण के शुभ चरणों ने इस गांव को धन्य किया था। गांव वासियों के निवेदन पर तेजाजी महाराज ने यहां रतवासा किया था। आज भी ग्रामवासी दृढ़ मान्यता से इस बात कोस्वीकारते है।उस समय यह गांव अभी के स्थान से दक्षिण दिशा में बसा हुआ था। उस जमाने में यहां डूडी व छरंग जाटगौत्रों का रहवास था। मगर किन्हीं कारणों से ये दोनों गौत्रे अब इस गांव में आबाद नहीं है।फिलहाल इस गांव में सभी कृषक जातियों का निवास है। गांव में लगभग 1500 घर है। नगवाडिया, जाखड़, सारण गौत्र के जाट यहां निवासित है। ऐसी मान्यता है कि पुराना गांव नाथजी के श्राप से उजड़ गया था। पुराने गांव के पास 140 कुएं थे जो अब जमींदोज हो गये हैं। उस जगह को अब 'सर' बोलते है। एक बार आयी बाढ से इनमें से कुछ कुएं निकले भी थे।...सन् 2003 में इस गांव में एक अनोखी घटना घटी। अकाल राहत के तहत यहां तालाब खौदा जा रहा था।जहां एक पुराना चबूतरा जमीन से निकला। वहीं पास की झाड़ी से एक नागदेवता निकला, जिसके सिर पर विचित्र रचना थी। नागदेवता ने तालाब में जाकर स्नान किया और उस चबूतरे पर आकर बैठ गया। ऐसा 2-4 दिन लगातार होता रहा। उसके बाद गांववालों ने मिलकर यहां भव्य तेजाजी मंदिर बनवाया। प्राण प्रतिष्ठा के समय रात्रि जागरण में भी बिना किसी को नुकसान पहुंचाये नाग देवता घुमते रहे। इस चमत्कारिक घटना के पश्चात तेजा दशमी को यहां भव्य मेला लगने लग गया। वह नाग देवता अभी भी कभी कभार दर्शन देते हैं।उक्त चमत्कारिक घटना तेजाजी महाराज का इस गांव से संबंध प्रगाढ़ करती है। गांव गांव का बच्चा इसऐतिहासिक जानकारी की समझ रखता है कि ससुराल जाते वक्त तेजाजी महाराज ने गांववालों के आग्रह पर यहां रात्रीविश्राम किया था।(चित्र में पुराने व नये दोनों तेजाजी मंदिरो को दर्शाया गया है। पहले यहां छौटा सा थान हुआ करता था। बाद में गांववालों ने मिलकर भव्य मंदिर का निर्माण करवाया)---जय वीर तेजाजी महाराजBalveer Ghintala 'तेजाभक्त'मकराना नागौर+91-9024980515-संत कान्हाराम जीसुरसुरा+91-9460360907

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