राम राम सा बंधुओं..
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अब तक हमने वीर तेजाजी महाराज के पूर्वजों से लेकर वीर तेजाजी के जन्म तक की घटनाओं का क्रमबद्ध रूप से अध्ययन किया है। अब तेजाजी के माता पिता की तीर्थ यात्रा व तेजाजी के विवाह पश्चात घटित घटनाओं पर चर्चा करेंगे।
बंधुओं मेरा उद्देश्य तेजाजी के इतिहास में आये किसी भी पात्र, घटना या किसी जाट गौत्र पर कटाक्ष करना नहीं है बल्कि यह तेजाजी के जीवन से जुड़ी वास्तविकता है जिसे शब्दों में उकेरने का प्रयास किया है। अगर किसी बात पर आपको ठेस पहुंचे तो जाट भाई समझ के माफ करना। 
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                                                =तेजाजी के माता पिता की तीर्थ यात्रा=
खरनाळ गणराज्य में तेजाजी के जन्मोत्सव के कुछ महिनों बाद एक दिन माता रामकुंवरी ने ताहड़ जी से अनुरोध किया कि हमें तीर्थराज पुष्कर चलना चाहिए। क्योंकि उस समय की यह परिपाटी रही थी कि संतान प्राप्ति के पश्चात गणपति तीर्थ यात्रा जाते थे तथा पुत्र स्नान के पश्चात यज्ञ व दानदक्षिणा किया करते थे।
माता रामकुंवरी ने भी ताहड़ जी से तीर्थ यात्रा पर चलने का अनुरोध किया तथा वापसी में नागदेवता की बांबी पर धौक देकर आने को बोला जिनकी कृपा से तेजल वीर का जन्म हुआ था।
देवप्रबोधिनी एकादशी के एक दिन पहले वि. सं. 1131 की कार्तिक शुक्ल दशमी के दिन प्रातः तेजल को लेकर सपत्नी ताहड़ जी पुष्कर यात्रा के लिए निकल पड़े।
गाड़ी में धन-धान्य दानदक्षिणा हेतू साथ ले लिया। अपने ईष्ट मित्रों व तेजाजी के एक काकाश्री आसकरण जी यात्रा में साथ आये।
देवप्रबोधिनी के दिन पूरे संघ ने पुष्कर के नाग घाट पर निर्मल जल में संध्यास्नान किया। तेजल कुंवर को स्नानादि करवा नागघाट पर मंगल कामना की गई। दीन दुखियों को मुक्तहस्त से दान दक्षिणा दी गई। और ब्राह्मणों को भोज दिया गया।
उस जमाने में संतानप्राप्ति के बाद पुष्कर तीर्थ यात्रा परिपाटी थी। पनेरगढ के गणपति रायमल मुहता को भी पेमल के रूप में पुत्री धन की प्राप्ति हुई थी। (वीर तेजाजी के जन्म के तीन माह पश्चात सती पेमल का जन्म हुआ था।) अत: रायमल जी भी सपरिवार पुष्कर पधारे हुए थे।
गढ खरनाळ व गढ पनेर के दोनों गणपतियों ने एक दूजे को राम राम किया। कुशलक्षेम पूछी। 
दोनों परिवार एकादशी से पूर्णिमा तक साथ-साथ स्नान ध्यान, देवदर्शन, दानदक्षिणा करते। दोनों का परिचय घनिष्ठता में बदल गया।
तब तेजल नौ मास के व पेमल छ: मास की थी। तेजाजी के काका आसकरण जी ने घनिष्ठता को रिश्तेदारी में बदलने का प्रस्ताव रायमल जी व ताहड़ जी के समक्ष रखा तो दोनों ने एक स्वर में हां कह दिया।
                                                              =तेजा पेमल का विवाह=
उस समय दोनों परिवार पुष्कर जैसे पवित्र स्थल की शरण में थे। पुष्कर पूर्णिमा जैसा पवित्र शुभ मुहुर्त भी नजदीक था। तथा शादी संपन्न करवाने हेतू एक से एक विद्वान पंडित भी पुष्कर में मौजूद थे। दोनों गणपतियों का कुल भी जाट जैसे उच्च कुल से संबंधित था। ऐसा पावन संयोग मानो देवतागण भी इस विवाह के लिए अति आकुल हो रहे थे। 
विवाह की तैयारियां होने लगी। पूर्णिमा में मात्र तीन दिन शेष रह गये थे। विवाह की स्वीकृति के लिए तेजाजी व पेमल के मामाओं को बुलावा भेजा गया। तेजाजी के मामाजी त्योद गांव के हेमूजी सोढी तय समय पर पुष्कर पहुंच गये। दूसरी तरफ पेमल का ननिहाल थौड़ा दूर था। पेमल का ननिहाल जायल के कालाओं में था। इसलिए पेमल के मामा श्री 'खाजू काला जी' को थौड़ी देर हो गई। 
दूसरी तरफ बूढे पुष्कर के नाग घाट पर रूपवान तेजल और सुकोमल रूपवति पेमल का वैदिक मंत्रोचार के साथ विसं 1131 पुष्कर पूर्णिमा की गौधूली वैला में विवाह संपन्न हुआ। पेमल के मामाजी फेरों के समय विवाह स्थल पर पहुंचे। विवाह संपन्न होने के पश्चात खाजू जी को पता चला कि उनकी भानजी का विवाह पारिवारिक दुश्मन ताहड़ जी के पुत्र के साथ संपन्न हुआ है। काला व धौळिया गौत्री जाट शासकों में काफी पहले से दुश्मनी चली आ रही थी। और इस तरह विवाह की उस शुभघड़ी में अनहोनी हो गई।
                                                              =पेमल के मामा की हत्या=
पेमल के मामा को यह संबंध गले नहीं उतरा। अत: वे पुष्कर घाट पर ही ताहड़ जी को भला बुरा कहने लगे। आसकरण जी व रायमल जी मुहता ने बीचबचाव का बहुत प्रयास किया। सदियों पुरानी दुश्मनी भूलकर अच्छी रिश्तेदारी निभाने की प्रार्थना की। अपने पूर्वजों द्वारा की गई राजनीतिक भूल के लिए ताहड़ जी ने खाजू जी काला से माफी भी मांगी। मगर क्रोध मनुष्य की सोचने की शक्ति खत्म कर देता है। एक तो जाट का खून, ऊपर से सीने में धधकती अपने पूर्वजों की हत्या के बदले की भावना ने खाजू जी को अंधा बना दिया। जब बात हद से आगे बढ गई तो खाजू जी व ताहड़ जी तलवारें लिये आमने सामने हो गये। पुष्कर का पवित्र नागघाट कहां विवाह की सुंदर शहनाईयों से गूंज रहा था, तलवारों की खनक में गरजने लग गया। दोनों ही पराक्रमी जाट यौद्धा मरने मारने को उतारू हो चुके थे। दोनों परिवार ना चाहते हुए भी इस काल निमित्त युद्ध को आंखों से देख रहे थे। और इस तरह वो घटित हो गया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। वीर तेजाजी के पिता ताहड़ जी के हाथों खाजू जी काला का वध हो गया। होना क्या था और हो क्या गया। क्रोध शांत हुआ तब ताहड़ जी को बहुत आत्मग्लानी हुई। दोनों परिवारों से हाथ जौड़कर माफी मांगी। रायमल जी समझदार व्यक्ति थे। उनकी नजर में खाजू जी को उनके किये की सजा मिली थी। क्योंकि सभी द्वारा समझाने पर भी उन्होने दोस्ती का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। रायमल जी ने पेमल के मामा की अति को समझने के कारण इस हादसे को दिल से नहीं लगाया। मगर पेमल की मां बेदल दे इसे दिल से लगा बैठी।अपनों की क्षति भला बुरा नहीं देखती। भाई की मौत पर वह भड़क उठी। उसने पुष्कर घाट पर ही प्रतिज्ञा कर ली कि खून का बदला खून से लेगी। विवाह संबंध विच्छेद का भी अपना आदेश सुना दिया। रायमल जी के बहुत समझाने पर भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ। आखिर रायमल जी ने यह सोचकर कि हादसे के घाव समय के मरहम से भर जायेंगे, वापस पनेरगढ जाने की तैयारी करने लगे।
                                                        ==पुष्कर से प्रस्थान=
पेमल के मामा की अवांछित हत्या ने दोनों परिवारों को अंदर तक झकझोर दिया। अब और कोई अनहोनी न हो जाये इस डर से दोनों संघ अपने अपने गणराज्य की तरफ प्रस्थान कर गये। तेजाजी के माता पिता की नागदेवता के बांबी के दर्शन की अभिलाषा मन में ही रह गई। सोचा क्या था, और क्या हो गया। मगर होनी को कौन टाल सकता है।
                                                     =बोदल दे का बालू से मिलना=
तेजाजी की सासू मां (बोदलदे) का प्रतिशोध सातवें आसमान पर था। हर पल हरघड़ी अपने भाई की मौत का बदला लेने की दुर्भावना अपने ह्रदय में पालती रही। उसके पीहर में बालू नाम का एक आदमी बदमाशों के गुट का सरदार था। चांग के कालिया मीणा मेरवाड़ा के तथा बालू मारवाड़ का कुख्यात धाड़वी थे। पशुधन चौरी, लूटपाट जैसे अपराध के लिए अपने अपने क्षेत्र में ये दोनों प्रसिद्ध थे। और दोनों अच्छे मित्र भी थे। क्योंकि चोर चोर मोसेरे भाई। 
बालू ने बोदलदे को कालिया से मिलाया। जिसे बालू की सलाह पर बोदलदे ने राखीबंध भाई बनाकर अपना दुखड़ा सुनाया। बोदलदे ने अपने प्रतिशोध की बात कालिया व बालू के सामने रखी तथा खून का बदला खून से लेने की बात दोहराई। कालिया ने अपनी मुंहबोली बहन को वचन दिया। और इस तरह कालिया व बालू बदले की भावना से ग्रसित मौके की तलाश में रहने लगे। कई बार इन आक्रांताओं ने खरनाळ गणराज्य में चोरी, लूटपाट व फसलों को नुकसान पहुंचाया। मगर खरनाल गणपति ताहड़जी ने हर प्रतिरोध का मुंहतौड़ जवाब दिया। इसी लुकाछिपी व छद्मयुद्धों में 9 वर्ष व्यतीत हो गए। दोनों पक्षों का पलड़ा बराबर रहा।
                                                                 =ताहड़ जी की हत्या=
राजकुमार तेजाजी 9-10 वर्ष की आयु के थे तब तक सबकुछ ठीक चल रहा था। कालिया-बालू की कुटिलताएं जारी थी मगर खरनाल सावधान था तथा अपनी उन्नति में अग्रसर था। 
विसं. 1139 के आसपास आसोज माह में गणराज्य की फसल देखने की लालसा से गणपति ताहड़ जी घोड़े पर सवार होकर दिन के तीसरे पहर खेतों की और निकल पड़े। दूसरी तरफ एक रात पहले से ही कालीया मीणा व बालू घात लगाये बैठे थे। सुअवसर जान कर दोनों सरदारों ने दलबल सहित ताहड़जी पर हमला बोल दिया। और ताहड़जी दुश्मनों से लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त हो गए। खरनाल में खबर पहुंचने तक दुश्मन उत्तर दिशा की तरफ भाग खड़े हुए। तेजाजी के वीर काका आसकरण जी ने दुश्मनों का पीछा कर ललकारा मगर शत्रु का संख्या बल में अधिक होने के कारण आसकरण जी भी अंतत: वीरगति को प्राप्त हुए।
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तेजाजी की शिक्षा दिक्षा
तेजाजी ननिहाल में
तेजाजी का खरनाल आना.. 
यह सभी वृतांत अगली कड़ी में.... 
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~ जय वीर तेजाजी ~
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लेखक-
Balveer Ghintala 'तेजाभक्त'
मकराना नागौर
9414980415
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संत कान्हाराम (अध्यापक)
सुरसुरा, अजमेर
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