राम राम सा बंधुओं...
अब तक हमने तेजाजी के पूर्वजों द्वारा खरनाळ गणराज्य की स्थापना करना, तत्पश्चात वीर तेजाजी महाराज के दादाश्री बोहतराज जी (बक्सा जी) के बारे में पढ़ लिया है। इससे आगे की श्रृंखला में आज हम बोहितराज जी के बड़े पुत्र व तेजाजी महाराज के पिताजी श्री ताहड़ जी (थिरराज), उनके पुत्रों व तेजाजी के जन्म के विषय में बात करेंगें ।
                                                           =प्रारंभिक जानकारी=
वैसे श्री बक्साजी व ताहड़ जी के कालक्रम की व्यवस्थित जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाई है। बक्साजी ने वृद्धावस्था में प्रवेश करते ही अपने गणराज्य की कमान प्रजा के आदेशानुसार अपने सबसे बड़े पुत्र ताहड़ जी को सौंप दी। 
बक्सा जी के सात पुत्र हुए थे जिनमें ताहड़ जी अस्त्र शस्त्र विद्या, युद्ध कौशल, धर्म व नीति की शिक्षा में सभी भाईयों से अधिक निपुण थे। इस प्रकार समस्त गणराज्य का भार ताहड़ जी को सौंपकर स्वयं संरक्षक में बक्साजी गणराज्य का संचालन करते रहे।
                                                              =ताहड़ जी का विवाह=
खरनाल परगने के जाट शासक (गणपति) बक्साजी धौळिया के बड़े पुत्र श्री ताहड़देव का विवाह त्योद (त्रयोद) के गणपति करसणजी के पुत्र राव दूल्हण जी सोढी (ज्याणी) की पुत्री रामकुंवरी के साथ वि. सं. 1104 में सम्पन्न हुआ था। 
(यह त्योद गांव अजमेर जिले के किशनगढ परगने से 22 किमी उत्तर दिशा में स्थित है)
                                                         =ताहड़ जी का दूसरा विवाह=
विवाह के 12 वर्ष पश्चात भी रामकुंवरी के पुत्रप्राप्ती नहीं हुई। सम्पूर्ण गणराज्य शोक के गर्त में डूबा चला जा रहा था। बक्साजी धौळिया भी इस चिंता में अस्वस्थ होते चले गये। खरनाळ गणराज्य इस समय अपने गणपति के दुख में आंसू बहा रहा था।
अपनी प्रजा, पति व श्वसुर के दुख ने रामकुंवरी को अंदर तक विचलित कर दिया। ऐसे समय में अपने ह्रदय को कठोर करके रामकुंवरी ने अपने पतिदेव ताहड़ जी को दूसरा विवाह करने का कहा। जिस पर ताहड़ जी ने मना कर दिया। मगर गणराज्य की खुशहाली, पिताजी की अस्वस्थता और पत्नी के हठ के आगे उन्हें झुकना पड़ा।
और इस तरह ना चाहते हुए भी ताहड़ जी का दूसरा विवाह कोयलापाटन (वर्तमान आठ्यासन) निवासी अखोजी (ईंटोजी) के पौत्र व जेठोजी के पुत्र करणो जी फिड़ौदा की पुत्री रामीदेवी के साथ वि.सं. 1116 में सम्पन्न हुआ। (इस विवाह का वर्णन फिड़ौदा जाटों के हरसोलाव निवासी भाटों की पोथी में आज भी वर्णित है)
यह संयोग था या ईश्वर प्रदत वरदान कि वीर तेजाजी महाराज की दोनों माताओं का नाम 'राम' से शुरू होता था।
                                                        =ताहड़ जी के पुत्र=
ताहड़ जी का रामी देवी से विवाह संपन्न होने के पश्चात उनके 5 पुत्रों का जन्म हुआ। जो इस प्रकार थे- 
1) रूप जी (धर्मपत्नी रतनी खींचड़),
2) रण जी (धर्मपत्नी शेरां टांडी), 
3) गुण जी (धर्मपत्नी रीतां भांभू), 
4) महेश जी (धर्मपत्नी राजां बसवाणी), और 
5) नग जी (धर्मपत्नी माया बटिमासर)।
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इनमें से रूप जी की पीढी इस प्रकार है-
दोवड़सी- जस्स जी- शेराराम जी- अरस जी- सुवाराम जी- मेवाराम जी- हरपाल जी।
(कई जगह लोकवार्ताओं में तेजाजी की भाभी का नाम केलां उच्चारित किया जाता है, मगर भाटों की पोथी में इसका कहीं भी उल्लेख नहीं है)
                                                  =रामकुंवरी का पीहर गमन व तपस्या=
ताहड़ जी के दूसरे विवाह के पश्चात रामकुंवरी अपने पीहर त्योद आकर रहने लगी व अपने कुलगुरू मंगलनाथ जी के निर्देशन में भौलेनाथ व नागदेवता की पूजा अर्चना करने लगी। 
लगभग 10-12 वर्ष पूजा व तप करने के पश्चात नागदेवता के वरदान से रामकुंवरी की कोख से उस वीर का जन्म हुआ जिसने सदियों तक के लिए लाखों किसानों को को अमर इतिहास दे दिया। वीर तेजाजी का जन्म नागदेवता के आशीष से हुआ था। नागदेवता जिनकी पूजा रामकुंवरी करती थी इनकी बांबी त्योद व पनेर के मध्य स्थित जंगल में आज भी विद्यमान है। मगर वर्तमान में इस जगह वीर तेजाजी बलिदान स्थल गांव सुर्रा (सुरसुरा) आबाद हो चुका है। तथा यह बांबी मुख्य मंदिर के गर्भगृह के अंदर वीर तेजाजी की भूप्रकट देवलियों के पास आज भी अवस्थित है। 
यह संयोग था या फिर विधि का लिखा विधान की जिन नागदेवता ने ने वरदान स्वरूप वीर तेजाजी को भूलोक पर भेजा उन्हीं ने वापस तेजाजी का खुद में समा लिया। शायद कलयुग के पापियों को दंड देने, व जनसाधारण का उद्धार करने के उद्धेश्य से ही वीर तेजाजी का जन्म हुआ था।
                                                         =तेजल-राजल का जन्म=
माता रामकुंवरी की कठोर साधना व नागदेवता के आशीष स्वरूप वि. सं. 1130 की माघ सुदी 14 गुरूवार, (29 जनवरी 1074) को खरनाल गणराज्य के कुलदीपक, कषकों के उपकारी, गरीब मजलूमों के रक्षक व जीवदया की साक्षात मूर्ति श्री वीर तेजाजी महाराज का जन्म हुआ। मुख पर सूर्य सा तेज लिए व रक्तिम आभायुक्त शरीर के जन्म का समाचार सुनकर त्योद व खरनाळ गणराज्य में जैसे खुशियों की सौगात बिखर गई। त्योद गांव की प्रजा ने अपने भाणजे को सर आंखो में बिठा लिया तो दूसरी तरफ खरनाळ की प्रजा अपने राजकुमार को देखने के लिए ललायित हो उठी।
वीर तेजाजी के जन्म के 3 वर्ष पश्चात साक्षात देवीस्वरूप लिये वि. सं. 1133 में राजल बाई का जन्म हुआ। 6 भाईयों की इकलोती व सबसे छोटी लाडली - राजल बहन। जिनके भातृप्रेम की मिशालें युगों युगों तक दी जायेगी।
                                                      =तेजाजी का खरनाल आगमन=
त्योद में तेजल राजकुमार के जन्मोत्सव की तैयारियां जोरों पर थी। उधर खरनाल से ताहड़ जी, उनकी धर्मपत्नी रामी व पांचों पुत्र तथा गणराज्य के कुछ वरिष्ठजन त्योद के लिए रवाना हो गये। निश्चित समय पर नामकरण समारोह संपन्न हुआ। रामी ने पुत्र तेजल को गौद में लेकर मातृप्रेम से सरोबार कर दिया तो पांचो भाईयों अपने छोटे बीर के साथ पूरे दिन हंसते खेलते रहे। हर किसी सदस्य के आंखो में खुशी की बूंदे झिलमिला रही थी। हर कोई खरनाळ गणराज्य की किस्मत पर आज गर्व की गाथाएं उच्चरित कर रहा था। खरनाळ की प्रजा की हठ, दादा बक्सा जी की पौत्रदर्शन की लालसा से वशीभूत हो तथा बहन रामी की प्रार्थना का मान रखते हुए माता रामकुंवरी अपने पुत्र तेजल को ले परिवारजनों के साथ खरनाळ के लिए रवाना हुई।
                                            =खरनाळ में जन्मोत्सव व युवराज की घोषणा=
अपने राजकुमार के स्वागत में गणराज्य की प्रजा ने पलक पांवड़े बिछा दिये। मूंडवा ग्राम जो कि गणराज्य की सीमा पर स्थित था, समस्त प्रजा वहां अपने राजकुमार की अगवानी करने पहुंच गई। तेजल, दोनों माताओं, पांचों राजकुमारों व गणपति ताहड़ जी को गाजे बाजे के साथ मूंडवा से खरनाळ लाया गया। जहां तेजाजी के काका-काकियों, व दादाजी द्वारा स्वागत किया गया।
पूरे गणराज्य में उस दिन उत्सव का माहौल था।
                                                =तेजाजी को युवराज घोषित करना=
समस्त प्रजा व परिवार जनों की उपस्थिति में बक्सा जी ने युवराज घोषित करने की इच्छा जाहिर की। प्रजा तेजल राजकुमार को युवराज घोषित होने की सूचना सुनने को ललायित थी मगर ताहड़ जी व बक्साजी तेजल से बड़े 5 भाईयों के होते यह फैसला लेने में हिचकिचा रहे थे। इस शंका का निवारण अंतत: तेजल राजकुमार की दूसरी माता रामीदेवी ने किया। बहन रामकुंवरी के बलिदान, तप व अपने पर किये उपकार के फलस्वरूप अपने पुत्रों को युवराज घोषित करने हेतू ताहड़ जी को मना कर दिया। 12 वर्ष के कठोर तप से जन्मे सौभाग्यशाली पुत्र तेजल को ही युवराज घोषित करने की इच्छा जताई। 
एक जाटनी ने जहां गणराज्य की समृर्द्धि हेतू जीते जी अपने पति को दूसरे विवाह के लिए मनाया तो वहीं दूसरी जाटनी ने पुत्रप्रेम को दरकिनार कर उनका ॠण चुका दिया। धन्य है जाट की जायी ऐसी सतवंती व मजबूत नारियां। और बड़भागी थे वीर तेजाजी महाराज जिन्हें अपने नाम (राम) के अनुरूप ही शील, धीर, व मातृत्व की प्रतिमूर्ति माताएं पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
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वीर तेजाजी का विवाह
वीर तेजाजी की प्रारंभिक शिक्षा-दिक्षा
अगली कड़ी में....... 
..जय वीर तेजाजी महाराज...
लेखक-
Balveer Ghintala 'तेजाभक्त'
मकराना नागौर
9414980415
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संत कान्हाराम (अध्यापक)
सुरसुरा, अजमेर
9460360907
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